मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

कहां है हमारा भाषाई स्वाभिमान

उमेश चतुर्वेदी
मौजूदा हालात में जिस तेजी से भारतीय जिंदगी के तमाम क्षणों में उदारीकरण और उसके जरिए आई नई सोच ने अपनी पैठ बनाई है...उसमें भाषाई स्वाभिमान की चर्चा करना ही बेमानी है। चूंकि भारतीयता की मौजूदा अवधारणा के बीज आजादी के आंदोलन की कोख में पड़े थे, लिहाजा मध्य वय की ओर बढ़ रही पीढ़ी को भाषाई अस्मिता के सवाल नई पीढी़ की तुलना में कहीं ज्यादा प्रभावित और विचलित करते रहे हैं। विचलन की इस स्थिति का विस्तार इन दिनों जारी एक भाषाई आंदोलन और उसके प्रति भारतीय भाषाओं के समाज के उदासीनता बोध के चलते कहीं ज्यादा हो रहा है।
 हिंदी में पहली बार 1985 में आईआईटी दिल्ली में बीटेक की प्रोजेक्ट रिपोर्ट लिख चुके श्यामरूद्र पाठक और उनके दो साथी गीता मिश्र और विनोद कुमार पांडेय 4 दिसंबर 2012 से ही एक महत्वपूर्ण सवाल को लेकर दस जनपथ के सामने धरने पर बैठे हैं। रोजाना उनका धरना सुबह नौ बजे शुरू होता है और शाम को पांच बजे निषेधाज्ञा शुरू होने के बाद पुलिस द्वारा खत्म करा दिया जाता है। सबसे अहम बात यह है कि इस धरने का मकसद इस देश की करीब 97 फीसदी आबादी का वह सवाल है, जिसका सामना पैंसठ साल से इंसाफ की दहलीज पर करती रही है। इन आंदोलनकारियों की मांग इंसाफ के दरवाजे पर जूझते लोगों को उनकी अपनी जुबान में इंसाफ मुहैया कराना है। 

सोमवार, 1 अप्रैल 2013

सांस्कृतिक लालित्य से भरपूर रचनाएं

उमेश चतुर्वेदी
पुस्तक- मन का तुलसी चौरा
लेखक  तरूण विजय
प्रकाशक  वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली 

कभी हिंदी पाठकीयता की श्रीवृद्धि में अहम स्थान रखने वाली ललित निबंध विधा अब भूले-भटके वाली विधा हो गई है। कारपोरेट दबाव में अब सीधी सपाट बयानबाजी पत्रकारिता का अहम स्थान बना चुकी है। इस बीच भी अगर कोई पत्रकार अपने लेखन में लालित्य को बचाए रख सका है तो निश्चित तौर पर उसे दाद देनी ही पड़ेगी। तरूण विजय अब महज पत्रकार ही नहीं रहे, बल्कि सांसद हो गए हैं। लेकिन उनके लेखन का लालित्य अब भी बरकरार है और हिंदी के चुनिंदा अखबारों में सामयिक विषयों पर भी उऩका भावोत्मक लेखन जारी है। मन तुलसी का चौरा उनके ऐसे ही अखबारी लेखों का संग्रह है। जिसे पढ़ते हुए आपको एक बार भी नहीं लगेगा कि आप अखबारी लेखों से गुजर रहे हैं। सामयिकता का दबाव अखबारी लेखन पर इस कदर हावी रहता है कि वहां प्रकाशन के कुछ ही घंटों बाद उस लेखन में बासीपन आ जाता है। लेकिन इस संग्रह में शायद ही कोई रचना हो, जिसमें यह बासीपन आ पाया होगा।

मंगलवार, 19 फरवरी 2013

मीडिया मीमांसा/ MEDIAMIMANSA: मदद के इच्छुक संपर्क करें

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संभावनाशील कविताएं


कविता संग्रह – मैं सड़क हूं
कवि – अर्पण कुमार
प्रकाशक – बोधि प्रकाशन, जयपुर
मूल्य – 75 रूपए

उमेश चतुर्वेदी
कविताओं में चित्रों का संसार कोई नई बात नहीं है। लेकिन कविताओं को पढ़ते वक्त कूची के कमाल का आभास बहुत कम कविताओं के साथ ही हो पाता है। लेकिन अर्पण कुमार के ताजा संग्रह मैं सड़क हूं की कविताओं को पढ़ते हुए यह अनुभव बार-बार होता है। उनकी कविताओं में सड़क है, नदी है, स्त्री है, धूप है, कुआं है, चाकू है, खूंटी है..आम जिंदगी में रोजाना तकरीबन सबका इनसे राफ्ता पड़ता है..लेकिन इन चीजों से भी संवेदना इतनी गहरे तक जुड़ी हो सकती है...इसे एक संजीदा कवि ही देख सकता है...अर्पण इन्हें देखने और उनके जरिए दर्द और उदासी भरी संवेदनाओं को उकेरने में कामयाब हुए हैं। मैं सड़क हूं संग्रह में कुल तैंतीस कविताएं हैं। लेकिन उनमें बुढ़ापे में अकेली होती मां भी है, उनका अपना पटना शहर भी है..जिसे पीछे छोड़ आए हैं...जिनके साथ उनकी सुंदर और संजीदा स्मृतियां जुड़ी हैं..लेकिन अब लौटते वक्त उन्हें वह पुरानी उष्मा नहीं मिलती। शायद इसी के बाद उनकी कविता फूट पड़ती है आजकल मैं पटना जंक्शन पर नहीं उतर रहा हूं। अर्पण के इस संग्रह में पिता की कवि छवियां हैं। पेंशनयाफ्ता की जिंदगी जीते पिता हैं, आश्वस्त पिता हैं...असमय बूढ़े हो रहे पिता हैं...लेकिन सबसे मार्मिक कविता है साठवें बसंत में कालकवलित हो चुके पिता..यह कविता जिंदगी के एक अंतहीन गह्वर में छोड़ जाती है। अर्पण के इस संग्रह में एक कविता है मजिस्टर राम का शरणार्थी यह लंबी कविता आजादी के पैंसठ साल बाद भी गांवों की बदहाली और वहां पिछड़े रह गए कमजोर लोगों की शहरों में शरणार्थी की तरह जिंदगी गुजारने की मजबूरी को मार्मिक तरीके से उठाती है। इस कविता को पढ़ने के बाद जिंदगी और विकास के दावे तार-तार होते जाते हैं...इस संग्रह की एक कविता इन दिनों मौजूं बन पड़ी है...महानगर में एक कस्बाई लड़की। इस कविता की कुछ पंक्तियां बेहद संभावनाशील हैं-लक्ष्मण रेखा के पार /निकल पड़ी है वह/ अपने बड़े से जूड़े को कस/असीमित आकाश को/ अपने आंचल में समेटने..इस संग्रह की शीर्षक कविता है मैं सड़क हूंयह कविता नए बिंब खड़ी करती है और बिंबों के जरिए संभावना के नए वितान भी तैयार करती है-तुम मुझे बनाते हो/ और फिर रौंदते हो/ अपने पैरों के जूतों/ अपनी गाड़ियों के पहियों/ और अपनी तेज अंतहीन रफ्तार से..इन कविताओं को पढ़ने बाद लगता है कि अर्पण में काफी संभावनाएं हैं। कुल मिलाकर यह संग्रह बेहद पठनीय बन पड़ा है। 

मंगलवार, 12 फरवरी 2013

इंदिरा दांगी के कथा संग्रह मेरी एक सौ पचास प्रेमिकाएं का विमोचन



जानी-मानी कथाकार इंदिरा दांगी के कथा संग्रह एक सौ पचास प्रेमिकाएं का लोकार्पण दिल्ली में चल रहे विश्व पुस्तक मेले में नामचीन समीक्षक नामवर सिंह ने किया। पुस्तक के लोकार्पण अवसर पर अशोक वाजपेयी, केदारनाथ सिंह सहित साहित्य जगत की कई हस्तियां उपस्थित थीं। प्रतिष्ठित राजकमल प्रकाशन से आए इस कथा संग्रह में विभिन्न मूड की इंदिरा की १३ कहानियां शामिल हैं। बकौल चित्रा मुद्गल इंदिरा की कहानियां परंपरा और आधुनिकता के द्वंद्व की कहानियां हैं। प्रतिष्ठित साहित्यकार ज्ञानरंजन का भी कथन है कि बुंदेलखंड से बाजार पटल पर आई एक नई लिखावट जिसने कम उम्र और कम समय में अपनी जगह बना ली है। (प्रेस विज्ञप्ति)

शुक्रवार, 8 फरवरी 2013

संघ की कवरेज....


आखिरी किश्त ...
दैनिक भास्कर ने 14 नवंबर को सुदर्शन प्रकरण में तीन खबरें प्रकाशित की है। एक ही शीर्षक सुदर्शन पर मानहानि के मुकदमे की सलाह से प्रकाशित पहली खबर नई दिल्ली से लिखी गई है। पहली खबर में संघ ने सोनिया गांधी को सुदर्शन पर मुकदमा चलाने का सुझाव दिया है। जयपुर से लिखी दूसरी खबर का उपशीर्षक है सुदर्शन हो सकते हैं गिरफ्तार। तीसरी खबर भोपाल से है मैदान में उतर सकता है संघ। यह खबर अंदर के पेज तक फैलाई गई है। दैनिक भास्कर ने 16 नवंबर को दो कॉलम की खबर प्रकाशित की। राजनाथ सिंह के हवाले से लिखी गई खबर का शीर्षक है कांग्रेस भ्रष्टाचार से ध्यान बंटाने को सुदर्शन को दे रही तूल : राजनाथ। भास्कर ने 16 को ही तीन कॉलम की एक खबर भी प्रकाशित की है सुदर्शन व राहुल-दिग्विजय के खिलाफ परिवाद पेश। इंदौर से लिखी इस खबर के साथ तीनों नेताओं के छोटे-छोटे फोटो भी प्रकाशित किया है।

बृहस्पतिवार, 24 जनवरी 2013

आरएसएस की कवरेज....



गतांक 10 से आगे...
राष्ट्रीय सहारा ने 14 नवंबर को फिर लिखा सुदर्शन पर कानूनी शिकंजा कसा। दो कॉलम की इस खबर को अगले पृष्ठ तक फैलाया गया है। राष्ट्रीय सहारा ने 15 नवंबर को तीन कॉलम की खबर भाजपा के पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह के हवाले से लिखा- संघ के बचाव में उतरे राजनाथ।
पंजाब केसरी ने सुदर्शन प्रकरण को लेकर 14 नवंबर को चार खबरें प्रकाशित कीं। भाषा के हवाले से अखबार ने दो कॉलम की खबर लिखा संघ के पूर्व प्रवक्ता ने सुदर्शन के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का सुझाव दिया।