सोमवार, 13 फरवरी 2012


पुस्तक समीक्षा
हिंदी क्षेत्र के निर्माण की पड़ताल
उमेश चतुर्वेदी

सामंती समाज की सबसे बड़ी खामी ये रही है कि वहां संवाद एक तरफा होता रहा है। सामंत, राज्य या राजा की तरफ से सूचनाएं और विचार तो जनता की तरफ प्रवाहित होते रहे हैं, लेकिन जनता सामंत, राज्य या राजा के बारे में क्या सोच रही है, उसकी अपेक्षाएं क्या हैं...इसे सामंत, राज्य या राजा की ओर प्रक्षेपित करने की कोई सुचारू व्यवस्था नहीं रही है। सत्रहवीं और अठारहवीं सदी के दौरान यूरोप में जो बदलाव आए और सामंती समाज को लोकतांत्रिक समाज और व्यवस्था में ढालने में मदद की, उसमें एक सार्वजनिक क्षेत्र ने अहम भूमिका निभाई। जर्मन दार्शनिक इसी प्रक्रिया पर आधारित एक अवधारणा पेश की, जिसे उन्होंने पब्लिक स्फेयर यानी सार्वजनिक क्षेत्र कहा जाता है। भारत में यह मान्यता रही है कि मध्यकालीन भारतीय समाज की सोच में लोकतांत्रिक समाज की ओर बदलाव यूरोप के रेनेसां की वजह से ही आया। पहले स्वाधीनता संग्राम तक की अवधि को देखें तो भारतीय समाज में सामंती मूल्यों की ही प्रधानता नजर आती है। लेकिन स्वाधीनता संग्राम की असफलता के बाद भारतीय समाज का यूरोपीय समाज के साथ संपर्क बढ़ा तो यहां भी सामंती मूल्यों में विचलन आने लगता है। निश्चित तौर पर इसमें एक बड़े वर्ग की भूमिका रही, जिसने समाज को आधुनिकता की दिशा में आगे बढ़ाया। 

सोमवार, 16 जनवरी 2012




बदलाव का कारगर हथियार बना सोशल मीडिया
उमेश चतुर्वेदी
सोशल नेटवर्किंग साइटों पर  नकेल कसने की तैयारी में जुटी सरकार शायद इसमें कामयाब हो भी जाय। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सरकार इस पर नकेल क्यों कसना चाहती है। दरअसल अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को जितनी तेजी से सोशल नेटवर्किंग साइटों ने वर्चुअल स्पेस में बढ़ावा दिया और फिर इसका असर जमीनी स्तर पर भी पड़ा। जिसके चलते पहले अप्रैल 2011 में सरकार को परेशान होना पड़ा। इसके बाद अगस्त 2011 में तो हद ही हो गई, जब अन्ना हजारे के लिए दिल्ली की सड़कों पर लाखों लोग उतर आए। सही मायने में देखें तो सोशल मीडिया यानी फेसबुक और ट्विटर ने देश में बदलाव की बड़ी भूमिका तैयार करने में मदद ही दी है। भारत में आज अगर भ्रष्टाचार विरोधी माहौल बना है तो उसमें मुख्य धारा की मीडिया की बजाय सोशल मीडिया का ज्यादा योगदान है। सोशल मीडिया पर बलिया जिले के सुदूरवर्ती गांव बघांव से लेकर कोयंबटूर तक से प्रतिक्रियाएं और सहयोग सामने आ रहा है। इसका असर ही है कि लोगों के भ्रष्टाचार के खिलाफ लामबंद होने में देर नहीं लगी और अन्ना का आंदोलन देखते-देखते जनआंदोलन बन गया।

बृहस्पतिवार, 1 दिसम्बर 2011

ताकि बन सके रोशनी की नई लकीर

उमेश चतुर्वेदी
"कोई भी बुद्धिमान शासक किसी ऐसे वचन का निर्वाह नहीं कर सकता और न ही उसे करना चाहिए..जिससे उसे नुकसान होता हो और जब उस वचन को पूरा करने के लिए बाध्यकारी कारण समाप्त हो चुके हों " - द प्रिंस  में मैकियावेली।
मशहूर लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता महाश्वेता देवी इन दिनों जिस तरह से ममता बनर्जी पर हमले कर रही हैं. ममता को फासिस्ट कहने से भी अब महाश्वेता देवी को झिझक नहीं रही। इससे मैकियावेली का यह कथन एक बार फिर याद आता है। माओवादी किशनजी की मुठभेड़ में हुई मौत के बाद तो वरवर राव तो ममता का विरोध कर ही रहे हैं, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और दूसरी वामपंथी पार्टियां भी ममता के खिलाफ हो गई हैं।

रविवार, 6 नवम्बर 2011

प्रशासन के लिए अंग्रेजी जरूरी क्यों?

हिंदी और भारतीय भाषाओं के लिए यूपीएससी के सामने 16 साल तक लंबा धरना चला चुके और 29 दिनों तक आमरण अनशन पर बैठे रहे राजकरण सिंह का उनके गांव बाराबंकी जिले के विष्णुपुरवा में 31 अक्टूबर को हो गया। भारतीय भाषाओं और हिंदी की संघलोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में क्या उपयोगिता हो सकती है...उसे लेकर उन्होंने एक लेख लिखा था। वही लेख श्रद्धांजलि स्वरूप यहां पेश है।
राजकरण सिंहयूपीएससी ने सिविल सर्विसेज, प्रीलिम्स 2011 के लिए जो नया पाठ्यक्रम घोषित किया है उसमें अंग्रेजी विषय को अनिवार्य बना दिया गया है। अभी तक इसके दो प्रश्नपत्र होते थे। एक सामान्य ज्ञान का और दूसरा किसी एक ऐच्छिक विषय का जिसे विद्यार्थी अपनी रुचि के अनुसार चुनता था। नई परीक्षा योजना के तहत इस विषय वाले प्रश्नपत्र के स्थान पर 200 अंकों का एक नया प्रश्नपत्र होगा, जिसमें से 30 अंक अंग्रेजी समझने की कुशलता के होंगे।

शनिवार, 5 नवम्बर 2011

पुस्तक समीक्षा

हिंदी आलोचना के छोटे मगर जरूरी अध्याय
उमेश चतुर्वेदी
क्या साहित्य को राजनीति के निकष पर कसा जा सकता है, आदर्श और यथार्थ की साहित्य में कितनी भूमिका होनी चाहिए, हिंदी साहित्य में बहस-चर्चा होती रहती है। साहित्य के बारे में कहा जाता रहा है कि वह समाज से ही मिट्टी-पानी ग्रहण करता है। जाहिर है, इसी मिट्टी पानी के एक रूप राजनीति भी है। इस तर्क के आधार पर तो साहित्य को राजनीति का अनुगामी और दर्पण भी होना चाहिए। लेकिन साहित्य समाज का दर्पण होते हुए भी वैसा दर्पण नहीं है, जो समाज के चेहरे को हू-ब-हू पेश कर दे। साठ के दशक के महत्वपूर्ण साहित्य आलोचक आचार्य नलिन विलोचन शर्मा साहित्य को ऐसा दर्पण मानते हैं, जो कुछ और भी दिखाता है और आगे की बात करता है। वे कहते हैं – साहित्य मिट्टी से पोषक तत्व प्राप्त करता है, किंतु अगर उसे मिट्टी से ज्यादा कुछ बनना है तो उसे आकाश की ओर उपर उठना ही पड़ता है।इस तरह वे साहित्य और राजनीति की सीमाएं भी निर्धारित कर देते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी के प्रोफेसर और आलोचक गोपेश्वर सिंह के संपादन में आई पुस्तकनलिन विलोचन शर्मा- संकलित निबंध से गुजरते हुए नलिन विलोचन शर्मा की ऐसे कई साहित्यालोचन और उसकी सैद्धांतिकता से रूबरू हुआ जा सकता है।

रविवार, 23 अक्तूबर 2011

तीज-त्यौहारों पर साहित्यकर्म की याद

उमेश चतुर्वेदीहर साल दीवाली जैसे – जैसे नजदीक आती है...अपने शहर की पत्रिकाओं की दुकान याद आने लगती है...इसलिए नहीं कि वहां हर साल दीपावली खास दीयों की रोशनी में मनाई जाती थी...इसलिए भी नहीं कि वहां दीपावली पर पत्रिकाओं और किताबों की खरीद पर खास छूट मिलती है...पत्रिकाओं की वह दुकान इसलिए याद आती थी कि तब पत्रिकाओं के दीपावली विशेषांकों की बाढ़ रहती थी...हर पत्रिका के दीपावली विशेषांक में एक से बढ़कर एक रचनाएं...लेखों का खजाना...क्या नहीं रहता था। घोर उपभोक्तावाद के इस दौर में पत्रिकाओं की इस तरह से याद ...रचनाओं की आहट की खोज...प्रगतिकामियों को असहज कर सकती है

शुक्रवार, 14 अक्तूबर 2011

इतिहास ब-जरिए ज्ञान-विज्ञान


अब तक इतिहास को सिर्फ दो ही नजरिए से ज्यादा देखा-समझा गया है। इसी नजरिए से उसे लिपिबद्ध भी किया गया है। शासकों की वंशावली और उनके जीत-हार, उनकी शासन व्यवस्था, उनके अत्याचार और उनके जनहित की योजनाओं के आधार पर ही अब तक इतिहास लेखन हुआ है।